भारत-चीन व्यापार : लिपुलेख से खुली राह पर कारोबार की डगर बाकी
hys_adm | August 3, 2026 | 0 | देश-दुनिया , पहाड़ की बात
हिमालय की ऊंची चोटियों के बीच स्थित लिपुलेख दर्रे ने एक बार फिर पुराने दिनों की आहट सुनी। छह साल तक बंद पड़े भारत-चीन पारंपरिक सीमा व्यापार के रास्ते आखिरकार खुल गए हैं और भारतीय व्यापारियों का पहला दल तिब्बत के तकलाकोट मंडी पहुंच चुका है। सीमांत क्षेत्र में इसे नई उम्मीदों की शुरुआत माना जा रहा है, लेकिन इस उम्मीद के साथ कई सवाल और चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं। व्यापार शुरू होने की घोषणा हो चुकी है, मगर कारोबार अभी उस मुकाम तक नहीं पहुंचा है, जहां इसे पूरी तरह सामान्य कहा जा सके।
एक अगस्त 2026 को भारत-तिब्बत व्यापार संघ के अध्यक्ष जीवन सिंह रौकली के नेतृत्व में 16 व्यापारी और चार हेल्पर लिपुलेख दर्रे को पार कर तकलाकोट पहुंचे। यह छह साल बाद भारतीय व्यापारियों का पहला आधिकारिक दल है। इसमें महिलाएं भी शामिल हैं। हालांकि इस दल के सदस्य अपने साथ भारत से कोई नया व्यापारिक माल नहीं ले जा सके। फिलहाल उन्हें केवल वहां मौजूद पुराने स्टॉक, दुकानों और गोदामों की स्थिति का जायजा लेने तथा आवश्यक औपचारिकताएं पूरी करने की अनुमति मिली है।

उम्मीदों पर लगा था ब्रेक
इस वर्ष जून से ही व्यापार बहाली की प्रक्रिया शुरू हो गई थी। सीमांत क्षेत्र के रं (शौका) समुदाय के व्यापारी महीनों पहले से तैयारी में जुट गए थे। कई व्यापारियों ने लाखों रुपये का सामान खरीदकर गुंजी तक पहुंचा दिया था। उम्मीद थी कि जुलाई के पहले सप्ताह में व्यापार शुरू हो जाएगा, लेकिन ऐन मौके पर चीनी प्रशासन ने तकलाकोट में भारतीय व्यापारियों के लिए बनाए जा रहे गोदामों और दुकानों का निर्माण अधूरा होने का हवाला देकर प्रवेश रोक दिया। इस फैसले ने व्यापारियों की उम्मीदों को बड़ा झटका दिया। कई लोगों का पैसा माल और परिवहन में फंस गया, जबकि पूरा कारोबारी कार्यक्रम अनिश्चितता में चला गया। करीब एक महीने बाद अब पहला दल सीमा पार कर पाया है।

व्यापार शुरू, लेकिन गतिविधियां अभी सीमित
सीमा व्यापार की औपचारिक बहाली के बावजूद वास्तविक कारोबारी गतिविधियां अभी सीमित हैं। चीन ने फिलहाल केवल पुराने और पूर्व पंजीकृत व्यापारियों को ही अनुमति दी है। नए माल की ढुलाई और नियमित खरीद-बिक्री शुरू होने में अभी समय लग सकता है। व्यापारियों का कहना है कि व्यापार की वास्तविक बहाली तब मानी जाएगी, जब सभी पंजीकृत व्यापारियों को अवसर मिलेगा और भारत से सामान लेकर जाने की प्रक्रिया भी शुरू होगी।

दो महीने का कारोबारी समय निकल चुका
सीमांत व्यापारियों की सबसे बड़ी चिंता समय को लेकर है। सामान्य तौर पर यह व्यापार जून से शुरू हो जाता था, लेकिन इस बार अगस्त में पहला दल तकलाकोट पहुंच पाया है। यानी कारोबारी सीजन के दो महत्वपूर्ण महीने पहले ही निकल चुके हैं। हिमालयी क्षेत्रों में मौसम की सीमाएं व्यापार की अवधि को पहले से ही छोटा बना देती हैं। अक्तूबर के बाद ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फबारी शुरू होने लगती है। ऐसे में व्यापारियों के पास इस साल कारोबार के लिए अपेक्षाकृत कम समय बचा है।
नेपाल को मिली शुरुआती बढ़त
व्यापार शुरू होने में हुई देरी के दौरान नेपाल की भूमिका भी चर्चा में रही। जब भारतीय व्यापारी अनुमति का इंतजार कर रहे थे, तब नेपाली व्यापारी पहले से तकलाकोट मंडी में सक्रिय थे। इससे शुरुआती सीजन का लाभ उन्हें मिला और मंडी में उनकी मौजूदगी मजबूत हुई। भारतीय व्यापारियों के प्रवेश के बाद प्रतिस्पर्धा जरूर बढ़ेगी, लेकिन शुरुआती बढ़त नेपाल के पक्ष में जाती दिखाई देती है।

छह साल से तकलाकोट में फंसी थी करोड़ों की पूंजी
सीमा व्यापार की बहाली का सबसे बड़ा लाभ उन व्यापारियों को मिलने की उम्मीद है, जिनका सामान 2019 में व्यापार बंद होने के बाद तकलाकोट में ही छूट गया था। कोरोना महामारी और बाद में भारत-चीन संबंधों में आए तनाव के कारण व्यापार अचानक ठप हो गया और कई व्यापारी अपना माल तिब्बत में छोड़कर लौट आए थे। व्यापार समिति के अनुसार तकलाकोट में भारतीय व्यापारियों का एक करोड़ रुपये से अधिक का सामान वर्षों से पड़ा हुआ है। व्यापारियों को यह तक नहीं पता था कि छह साल बाद उनका सामान किस स्थिति में मिलेगा। यही वजह है कि पहले चरण में जिन व्यापारियों को अनुमति मिली है, उनके लिए यह यात्रा केवल नए व्यापार की शुरुआत नहीं, बल्कि वर्षों से फंसी अपनी पूंजी और सामान का पता लगाने का अवसर भी है।
हिमालयी दर्रों का महत्व सिर्फ व्यापार नहीं
भारत और चीन के बीच अधिकांश व्यापार समुद्री मार्गों से होता है, लेकिन लिपुलेख, शिपकी ला और नाथू ला जैसे हिमालयी दर्रे आज भी ऐतिहासिक और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। 1962 के युद्ध के बाद अधिकांश पारंपरिक मार्ग बंद हो गए थे। बाद में सीमित स्तर पर कुछ दर्रों को व्यापार के लिए खोला गया। इन मार्गों से होने वाला कारोबार भले सीमित हो, लेकिन यह सीमांत समुदायों की आजीविका, सांस्कृतिक संपर्क और सीमा क्षेत्रों में भारत की उपस्थिति को मजबूत करने का माध्यम माना जाता है। लिपुलेख से ‘रं’ समुदाय तिब्बत के साथ इसी मार्ग से व्यापार करता आया है। यह रास्ता सांस्कृतिक संपर्क, सामाजिक रिश्तों और सीमांत जीवन का अभिन्न हिस्सा रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि सीमावर्ती क्षेत्रों में व्यापारिक गतिविधियां केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को ही नहीं, बल्कि सीमा पर आबादी और मानवीय उपस्थिति को भी बनाए रखती हैं। यही कारण है कि इस व्यापार को आर्थिक गतिविधि के साथ-साथ सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
छह साल बाद फिर सक्रिय हुए तीनों व्यापारिक दर्रे
लिपुलेख से व्यापार बहाली कोई अकेली घटना नहीं है। भारत और चीन ने छह साल बाद अपने तीनों पारंपरिक हिमालयी व्यापार मार्ग-उत्तराखंड का लिपुलेख, हिमाचल प्रदेश का शिपकी ला और सिक्किम का नाथू ला-फिर से सक्रिय कर दिए हैं। ये मार्ग 2020 में कोरोना महामारी और भारत-चीन सीमा तनाव के कारण बंद हो गए थे। नाथू ला ऐतिहासिक सिल्क रूट का हिस्सा रहा है, जबकि शिपकी ला हिमाचल और तिब्बत के बीच पारंपरिक संपर्क का प्रमुख मार्ग है। तीनों दर्रों का एक साथ खुलना केवल व्यापारिक गतिविधियों की बहाली नहीं, बल्कि भारत-चीन संबंधों में धीरे-धीरे लौटती सामान्य स्थिति का संकेत भी माना जा रहा है।