काखड़ी चोरी की गाली नहीं लगती बल! - पर्यावरण

काखड़ी चोरी की गाली नहीं लगती बल!

hys_adm | October 4, 2020 | 57 | खेती-किसानी , जीवन-शैली , पर्यावरण , पहाड़ की बात

काखड़ी चोरी की गाली नहीं लगती बल! यह बात आप हर पहाड़ी के मुंह से यदा कदा सुन ही लोगे। आाखिर कैसी होती है ये काखड़ी और ऐसा क्या खास है इसमें। चोर क्यों करते हैं इसकी चोरी? क्या आपको पता है! ‘काखड़ी’ लोक की स्मृतियों में बहुत ही गहरे से रचा बसा नाम है। इसी कारण इसको उगाने से लेकर खाने के चर्चे खूब सारे गीतों, कहानियों और किस्सों में मिलते हैं। काखड़ी की हरी भरी बेल जब ठाकरों यानी इसको सहारा देने वाली टहनियों पर फैलती है तो राहगीरों की नजरें इस ओर बरबस आ ही जाती हैं। ऐसे में इसकी चोरी न हो ऐसा कैसे हो सकता है।

काखड़ी (पहाड़ी खीरा) की बेल। स्थानीय भाषा में लगुली या झयाल भी कहते हैं।

बसग्याल (बरसात का मौसम) में पहाड़ के घर आंगन में फलने-फूलने वाली बेल है काखड़ी। जिस पर लंबी लंबी काखड़ी के लगते ही चारों ओर चोर सक्रिय हो जाते हैं। इसकी चोरी को लेकर लोक में अनोखी मान्यता है। पहाड़ में यह धारणा आम है कि काखड़ी की चोरी में दी जाने वाली गालियां किसी को लगती नहीं हैं। यानि किसी को कोई नुकसान नहीं होता है। इसीलिए इसकी चोरी भी खूब होती है।

काखड़ी बेल बरसात के मौसम में आकर्षण का केंद्र भी होती है।

तो चलिए आपको मिलाते हैं, काखड़ी के प्रबल चोर से। जिसका नाम सुनते ही आप चौंक पड़ेंगे। काखड़ी के सबसे प्रबल चोर हैं, गांव घरों के बच्चे, जो दिन-दोपहरी या रात को चुपके से आकर बेल से काखड़ी ले उड़ते हैं। चोरी की गई काखड़ी का स्वाद ही कुछ अलग होता है। काखड़ी चोरी में सफल होने की खुशी इसका जायका बढ़ा देती है। इन चोरों से बचाने के लिए ग्रामीण काखड़ी की बेलों की सख्त पहरा दिया जाता है। कई बार लोग इन बेलों पर घंटियां या कनस्तर भी बांध देते हैं, ताकि देर रात आने वाले चोरों को पता लगाया जा सके।

बेल से काखड़ी तोड़ने के बाद बच्चों के चेहरे पर खुशी का एहसास किसी बड़ी जीत से कम नहीं होता। -प्रतीकात्मक तस्वीर

इन चोरों के अलावा काखड़ी का चोर कहें या किसानों का दुश्मन इससे पार पाना बहुत ही कठिन होता है। इस चोर के बारे में आपको बताने से पहले चलिए जानते हैं, इसको खाने के तरीके के बारे में। बेल से तोड़ी गई काखड़ी को सबसे पहले पतली-पलती फांकों में काटा जाता है, फिर इसमें लगाया जाता है हरे लहसुन और मिर्च के साथ पिसे गए चटपटे नमक को। अहा क्या गजब का स्वाद आता है तब! देखो न मुंह में पानी आने लग गया है। इससे रायता या सलाद के तौर भी उपयोग किया जाता है, लेकिन सबसे ज्यादा प्रचलन काखड़ी की लंबी-लंबी फांक पर लगाए गए झन्नाटेदार नमक के साथ चटकारे लेकर खाने का है।

पहाड़ी नमक के साथ काखड़ी खाने का स्वाद दोगुना हो जाता है।

पहाड़ का खेतीहर समाज बेल पर लगी पहली ककड़ी को अपने देवताओं को अर्पित करना नहीं भूलते। यह भूमि, जल और प्रकाश देने वाले उन तमाम देवताओं को अर्पित किया जाता है, जिनके भरोसे पहाड़ की खेती, जीवन और पशुधन होता है। देवताओं के अर्पण के बाद इसको खुद खाने के साथ अपने अपने सगे संबंधियों को दिया जाता है।

कटी काखड़ी की फांक देखकर मुंह में पानी आ जाता है।

अरे! चलिए आपको बताते हैं, काखड़ी के सबसे बड़े चोर के बारे में। ठाकरों पर फैली बेलों से काखड़ी चोरने के लिए बंदरों की टोली जब-तब चक्कर लगाती रहती है। इनकी कितनी भी चौकीदारी करो ये छुपते-छुपाते काखड़ी को साफ कर ही देते हैं। तो चलिए आपको इन चोरों यानि बंदरों से काखड़ी को बचाने के नए तरीके के बारे में बताते हैं।

बंदरों से बचाने के लिए काखड़ी पर कपड़े वाली थैली लगाने का जुगाड़ कारगर है।

जैसे-जैसे काखड़ी बढ़नी शुरू हो जाए तो बाजार से सब्जी की कपड़े की थैलियों से ढक लेना है। ये थैलियां हवादार होने से काखड़ी को बढ़ने में नुकसान नहीं पहुंचाती हैं। वहीं बंदरों को चकमा देने का काम करती हैं। इन थैलियों को लगाने से एक और फायदा हो रहा है इससे काखड़ी को खाने वाले कीट पतंगों की पहुंच भी बाधित हो जाती है। तो आप जब भी पहाड़ घूमने जाएं वहां के बाजारों से काखड़ी खरीदना न भूलें। हां, चोरी का ख्याल मन में भी मत लाना!

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