फेर बल्दा फेर! खेती में पशुओं के उपयोग का अनोखा तरीका -

फेर बल्दा फेर! खेती में पशुओं के उपयोग का अनोखा तरीका

hys_adm | September 30, 2020 | 0 | कैटेगरी , जीवन-शैली , पहाड़ की बात

फेर बल्दा फेर बल्दा फेर फेर फेर फेर! पहाड़ के घरों के आंगन में जब फेर बल्दा की आवाजें बैलों की घण्टियों के साथ गूंजने लगे तो समझिए फसल को कोठार तक पहुंचाने की तैयारी जोरों पर चल रही है। गेहूं की कटाई के बाद उसकी मंडाई करने के लिए बैलों का उपयोग यहां आम बात है। इसको पहाड़ में दैं करना कहते हैं। तकनीकी की खूब सारी दखल के बावजूद खेती में पशुओं के उपयोग का यह अनोखा तरीका आज भी जारी है। पहाड़ की खेती, किसान और पशुओं के साझे उपक्रम का यह जीवंत दस्तावेज है। तो चलिये आपको भी रूबरू कराते हैं पहाड़ की इस जीवंत प्रक्रिया से।

गेहूं की फसल तैयार होते ही पहाड़ का किसान कटाई के लिए खेतों में परिवार सहित जुट जाता है। खेतों से गेहूं को गटठ्र पीठ पर ढोकर घर लाए जाते हैं। घरों के आंगन को गोबर और मिट्टी से लीपकर तैयार किया जाता है। गेहूं की कटाई करने के बाद शुरू होता है, गेहूं की बाल को छांटकर उसके मुट्ठे बनाने का काम।

गेहूं की बालियों के इन मुट्ठों से बालियों को काटकर सुखाने के लिए आंगन में फैलाया जाता है। जब गेहूं की बालियां ठीक ठंग से सूख जाती हैं तो फिर उसके ऊपर बैलों को घुमाया जाता है। बैलों के घूमते रहने से उनके मजबूत व वजनी पावों से गेहूं के दाने बालियों से अलग हो जाते हैं।

इस दौरान गेहूं की बालियों की खुशबू से आंगन महकने लगता है। ऐसे में बैल बालियों को खाने से अपने आपको रोक पाएं ऐसे कैसे हो सकता है, लेकिन बैल अगर गेहूं को जाएंगे तो फिर किसान क्या खायेगा? इसलिए उनके मुंह पर म्वाला लगाया जाता है। म्वाला यानि जाली या रिंगाल का बना मास्क। इसे उनके मुंह पर बांधा जाता है, जिससे वे अनाज को नहीं खा पाते। यह चालाकी तो है, लेकिन किसान के लिए जरूरी भी लगता है। बैलों के घूमते रहने से जब कुछ देर में सारे दाने बालियों से अलग हो जाते हैं तो फिर बैलों को विदा किया जाता है।

बैलों की पीठ और झुण्ड को सहलाया जाता है और इस अहम काम के बदले उनके पीण्डा दिया जाता है। पीण्डा यानि बहुत से अनाज से बना स्वादिस्ट भोज खिलाया जाता है। खेती में मदद करने वाले बैलों का इस तरह सतकार खेती किसानी का मूल आधार को दर्शाता है। ये जीवतंता और आत्मीयता है किसान की अपने हल-बैल और उसकी छोटी-छोटी प्रक्रियाओं के प्रति।

फिर शुरू होता है गेहूं से फूस को अलग करने का काम। इसके लिए भले ही आज पंखे का चलन शुरू हो गया हो, लेकिन परम्परागत रूप से किसी चादर या बोरी से हवा करके साफ किया जाता है। इसे फट्याला लगाना कहते हैं। पंखे या फट्याला के आगे महिलाएं सूप से धीरे-धीरे ऊंचाई से भूसा वाले गेहूं को गिराती हैं। हवा से भूषा दूर छिटक जाता है और गेहूं के चमकीले दाने एक तरफ इकट्ठे होते रहते हैं। साफ हुए दानों को करीने से एक ढेरी बनाई जाती है। जहां एक बड़ी छन्नी से गेहूं के दानों से बालियों की ठूंठ या बचे टुकड़ों को अलग किया जाता है। फिर इन गेहूं की ढेरी के ऊपर साफ कपड़े से ढका जाता है। फिर साफ गेहूं की ढेरी से ढलूण यानि डलिया में भर-भर कर कोठार तक पहुंचाया जाता है। इन गेंहू से ही सालभर चलता है पहाड़ के लोगों को चूल्हा।


ऐसा नहीं है कि पहाड़ में गेहूं की मंडाई करने का यह एक मात्र तरीका हो। पहाड़ के गावों में अलग-अलग जगहों पर ये अलग-अलग तरीकों से किया जाता है। गांवों में अपनी सुविधा और संसाधन के हिसाब से खूब सारे अन्य तरीको का भी इस्तेमाल किया जाता है। कई जगहों पर गेहूं के पौध को सूखाकर आंगन में पटका जाता है जिससे दाने बालियों से अलग होते हैं। कई जगह गेहूं की बालियों को डंडे से कूटकर भी साफ करने की परम्परा है।
इन सभी कामों को देखा जाए तो पहाड़ की भौगोलिक बनावट के हिसाब से गढ़े गए हैं। अपने आस-पास के संसाधनों का बेहतर उपयोग करने के लिए इनको किया गया है। भले ही आज मानव श्रम की जगह मशीनें ले रही हो इसके बावजूद पहाड़ में आज भी ज्यादातर गांवों में इन परम्परागत प्रक्रियाओं का उपयोग किया जा रहा है।


दैं करना पहाड़ के लोगों के लिये किसी महोत्सव से कम नहीं हैं। मौसम की मार, बंदर और जंगली जानवरों से बचाई फसल को समेटने का यह उत्साह पहाड़ के आंगनों में साफ दिखाई देता है। इस पूरे काम में घर के बच्चे, बड़े और बूढ़े अपनी अपनी सामर्थ के हिसाब जुटते हैं। छह महीनों की मेहनत को समेटने के लिए सभी जुटते हैं और अपने कोठार तक इसको समेटने का उत्सव मनाते हैं। पहाड़ की खेती-किसानी की ये परम्पराएं, हल-बैल और खेत के समृद्ध ताने बाने में हमेशा ऐसी जीवंतता रहे। ऐसी कामना करते हैं।

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